धर्म आस्था

ध्यान एक रहस्य

ध्यान क्या है? कुछ लोगों के लिए यह एक शांति देने की विधा है, कुछ इससे अपने मन-मस्तिष्क को शांत करने का प्रयास करते हैं तथा कुछ लोग इसके द्वारा यह प्रयास करते हैं कि स्वयं के भीतर क्या है। वास्तव में ध्यान को मात्र ताज़गी अथवा क्षणिक शांति की राह समझ लेना, ध्यान कला के साथ न्याय नहीं है। ध्यान वास्तव में क्या है? ध्यान यह जान लेने की तकनीक है कि आप क्या हैं और आपका लक्ष्य क्या है। ध्यान जब घटित होता है तो यह आपको अन्तःस्थल से पूर्णतः परिवर्तित करके रख देता है, आप वह नहीं रह जाते जो आप हैं, आप अपना किरदार खो देते हैं। वास्तव में ध्यान आपको शून्य बना देने की कला है। शून्य का अर्थ है विचारशून्य। आप हर समय कुछ विचार कर रहे होते हैं, यहाँ तक कि इस समय आप मेरे इस लेख पर विचार कर रहे हैं तथा इसके बाद कुछ और विचार करेंगे। हमारे विचार कभी मरते नहीं हैं, और इन विचारों को मार देने का साधन ही ध्यान है। ध्यान जब वाकई में धारण होता है तब आपके मन से विचार मिट जाते हैं, तब सिर्फ आपका अस्तित्व शेष रह जाता है जो आप हैं। आपने कभी स्वयं को नहीं जाना। जबसे आपका जन्म हुआ, आपने अपने आस-पास जो भी कुछ समाज में देखा ,सीखा, समझा, उसी के अनुरूप स्वयं को ढाल लिया। आपने यह जानने का वाकई प्रयास नहीं किया कि आप यहाँ क्यों आए हैं, और आपका लक्ष्य क्या है। हमारा जीवन विचारों पर केंद्रित है। हम जिस अभिलाषा की पूर्ति के अभाव में मृत्यु को प्राप्त हुए या यों कहें कि जिस अधूरी इच्छा को साथ ले कर मरे थे , वही इच्छा की पूर्ति हेतु प्रकृति हमें पुनर्जन्म देती है। यही एक कारण है कि हमारे वर्तमान जीवन में हम जो लक्ष्य बनाते हैं वो पूरी तरह सफल नहीं होते, हमारी प्रकृति हमें उन्हें पूरा होने से रोकती है और हम दोष ईश्वर को देते हैं। वास्तव में इसमें ईश्वर का कोई दोष नहीं वरन जो कुछ है , हमारा है। उदहारण के लिए किसी ने बड़ा उद्योगपति बनने का सपना देखा, उस पर कार्य किया और बीच में ही मर गया। अब उसका पुनर्जन्म हुआ और उसके आस पास के समाज से उसे ऐसी प्रेरणा मिली कि वह एक सरकारी कर्मचारी बने। उसने उस ओर मेहनत की और संभवतः वह उसमे आंशिक रूप से सफल भी हुआ, फिर अचानक एक दिन उसके मन में ख्याल आया कि उसे धंधा करना चाहिए और वह नौकरी छोड़कर धंधे में लग गया, और बहुत बड़ा उद्योगपति बना। लोगों की नज़र में उसकी किस्मत अच्छी थी, परन्तु वास्तविकता में यह वह विचार था जो बीजरूप में उसके अंतस में समाहित था। उसे नहीं पता था कि ऐसा क्यों हुआ परन्तु नियति ने उसे वह दिया जिसकी उसने पूर्वजन्म में इच्छा की थी। अब यदि हम ध्यान साधना करें, तो यह जानने की सम्भावना बढ़ जाती है की हम वास्तविकता में क्या हैं और हमने जन्म क्यों लिया। ध्यान एक ऐसी साधना है जो आपको आपकी आत्मा से साक्षात्कार करवाती है, और तब आपका यह भ्रम टूटता है कि आप शरीर हैं। जिस दिन यह ध्यान आपको आपके शरीर से पृथक इकाई अनुभव करवा देगा, आप आत्मसाक्षात्कार कर लेंगे, और आप यह जान जाएंगे कि आपके ऊपर समाज ने कितनी तरह की लोक-लाज, यश-अपयश की चादरें बिछा रखी हैं। जब स्वयं को जान लिया तो फिर कुछ और जानना बाक़ी नहीं रह जाता, और वास्तव में यही ध्यान है। मै अगले पोस्ट में ध्यान विधि से सम्बंधित क्रियाओं का विस्तार से वर्णन करने का प्रयास करूँगा। 

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