धर्म आस्था

उज्जैन के धार्मिक एवं ऐतिहासिक स्थल

 उज्जैन भारत के मध्यप्रदेश राज्य का एक प्रमुख शहर है जो क्षिप्रा नदी के किनारे बसा है। यह एक अत्यन्त प्राचीन शहर है। यह विक्रमादित्य के राज्य की राजधानी थी। इसे कालिदास की नगरी के नाम से भी जाना जाता है। यहां हर 12 वर्ष पर सिंहस्थ कुंभ मेला लगता है। भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में से महाकाल इस नगरी में स्थित है। उज्जैन मध्यप्रदेश के सबसे बड़े शहर इंदौर से 55 किलोमीटर पर है। उज्जैन के प्राचीन नाम अवन्तिका,उज्जयिनी,कनकश्रन्गा आदि है। 

उज्जैन मंदिरों की नगरी हैं यहां कई तीर्थ स्थल है। पुराणों में उल्लेख है कि भारत की पवित्रतम सप्तपुरियों में अवन्तिका अर्थात उज्जैन भी एक है। इसी आधार पर उज्जैन का धार्मिक महत्व अतिविशिष्ट है। यहां पर श्मशान,ऊषर,क्षेत्र,पीठ एवं एन-ये 5 विशेष संयोग एक ही स्थल पर उपलब्ध हैं। यह संयोग उज्जैन की महिला को और भी अधिक गरिमामय बनाता है।

श्मशान ऊषर,क्षेत्र, पीठं तु वनमेव च,

पंचैकत्र न लभ्यते महाकाल पुरदृते।

उक्त दृष्टिकोण से मोक्षदायिनी क्षिप्रा के तट पर स्थित उज्जैन प्राचीनकाल से ही धर्म,दर्शन,संस्कृति, विद्या एवं आस्था का केंद्र रहा है। इसी आधार पर यहां कई धार्मिक स्थलों का निर्माण स्वाभाविक रूप से हुआ। हिंदू धर्म और संस्कृति के पोषक अनेक राजाओं,धर्मगुरूओं एवं महंतों ने जनसहयोग से इस महातीर्थ को सुंदर एवं आकर्षक मंदिरों, आराधना स्थलों आदि से श्रृंगारित किया है। उज्जैन के प्राचीन मंदिर एवं पूजा स्थल जहां एक ओर पुरातत्व शास्त्र की बहुमूल्य धरोहर है वहीं दूसरी ये हमारी आस्था एवं विश्वास के आदर्श केंद्र भी है।

महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग-

आकाशे तारंक लिंगं,पाताले हाटकेश्वरम॥

मृत्युलोके च महाकालौ: लिंगत्रय नमोस्तुते॥

अर्थात् ब्रह्मांड में सर्वपूज्य माने गए तीनों लिंगों में भूलोक में स्‍थित भगवान महाकाल प्रधान हैं। 12 ज्योतिर्लिंगों में इनकी गणना होती है। उज्जैन के प्रथम और शाश्वत शासक भी महाराजाधिराज श्री महाकाल ही हैं, तभी तो उज्जैन को महाकाल की नगरी कहा जाता है। दक्षिणमुखी होने से इनका विशेष तांत्रिक महत्व भी है। ये कालचक्र के प्रवर्तक हैं तथा भक्तों की मनोकामनाओं को पूर्ण करने वाले बाबा महाकालेश्वर के दर्शन मात्र से ही प्राणिमात्र की काल मृत्यु से रक्षा होती है, ऐसी शास्त्रों की मान्यता है।

भारत के नाभिस्थल में, कर्क रेखा पर स्थित श्री महाकाल का वर्णन रामायण, महाभारत आदि पुराणों एवं संस्कृत साहित्य के अनेक काव्य ग्रंथों में प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है। कहा जाता है कि इस अतिप्राचीन मंदिर का जीर्णोद्धार राजा भोज के पु‍त्र उदयादित्य ने करवाया था। उसके पश्चात पुन: जीर्ण होने पर 1734 में तत्कालीन दीवान रामचन्द्रराव शेणवी ने इसका फिर से जीर्णोद्धार करवाया। मंदिर के तल मंजिल पर महाकाल का विशाल लिंग स्थित है जिसकी जलाधारी का मुख पूर्व की ओर है। साथ ही पहली मंजिल पर ओंकारेश्वर तथा दूसरी मंजिल पर नागचन्द्रेश्वर की प्रतिमाएं स्थित हैं।

स्मरण रहे कि भगवान नागचन्द्रेश्वर के दर्शन वर्ष में केवल 1 ही बार, अर्थात नागपंचमी पर होते हैं। महाकाल के दक्षिण में वृद्धकालेश्वर, अनादि कल्पेश्वर तथा सप्तऋषियों के मंदिर स्‍थित हैं, जबकि इसके उत्तर में चन्द्रादित्येश्वर, देवी अवन्तिका, बृहस्पतेश्वर, स्वप्नेश्वर तथा समर्थ रामदास द्वारा स्था‍पित श्री हनुमानजी का मंदिर है। इसके पश्चिम में कौटितीर्थ नामक कुंड है एवं समीप ही रुद्र-सरोवर भी स्थित है।

पूरे भारतवर्ष में यह एकमात्र ज्योतिर्लिंग है, जहां ताजी चिताभस्म से प्रात: 4 बजे भस्म आरती होती है। उस समय पूरा वातावरण अत्यंत मनोहारी एवं शिवमय हो जाता है।श्रावण मास तथा महाशिवरात्रि के अवसर पर यहां पर विशेष उत्सव होते हैं। श्रावण मास के प्रत्येक सोमवार को महाराजाधिराज महाकालेश्वर की सवारी निकाली जाती है। पूरे शहर को इस अवसर पर वंदनवारों एवं विद्युत बल्बों से सजाया जाता है। यह सवारी मंदिर प्रांगण से निकलकर शिप्रा तट तक जाती है। देश के कोने-कोने से लोग महाकाल के दर्शन हेतु उज्जैन आते रहते हैं। महापर्वों एवं विशेष अवसरों पर भीड़ अधिक होती है। इस ज्योतिर्लिंग की विशेषता यह है कि मुस्लिम समुदाय के बैंड-बाजे वाले भी श्री महाकाल की सवारी में अपना नि:शुल्क योगदान देते हैं। यह हिन्दू-मुस्लिम सौहार्द का अनूठा उदाहरण है।

श्री बड़े गणपतिजी का मंदिर—

श्री महाकालेश्वर मंदिर के निकट हरसिध्दि मार्ग पर बड़े गणेश की भव्य और कलापूर्ण मूर्ति प्रतिष्ठित है। इस  मंदिर का निर्माण 20वीं शताब्दी के प्रारंभ में महर्षि सांदीपनि के वंशज एवं विख्यात ज्योतिषविद् स्व. पं. नारायणजी व्यास द्वारा करवाया गया था। यह स्थान स्व. व्यासजी का उपासना स्थल भी रह चुका है। इस मंदिर में पंचमुखी हनुमानजी की अत्यंत आकर्षक मूर्ति प्रतिष्ठित है। इसके अतिरिक्त भीतरी भाग में, पश्चिम दिशा की ओर नवग्रहों की मूर्तियां है।

ज्योतिष एवं संस्कृत के विख्यात केंद्र के रूप में विकस‍ित यह स्थान हजारों छात्रों को अब तक शिक्षा प्रदान कर चुका है। श्री नारायण विजय पंचांग का प्रकाशन भी यहां से होता है। स्व. पं. नारायणजी व्यास के पुत्र प्रकांड विद्वान स्व. पं. सूर्यनारायण जी व्यास ने ज्योतिष, साहित्य और इतिहास के क्षेत्र में विशिष्ट योगदान दिया है।

श्री चिंतामण गणेश मंदिर-

यह एक प्राचीन मंदिर है। इस परमारकालीन मंदिर का जीर्णोध्दार महारानी अहिल्याबाई ने करवाया था। यहां पर श्री चिंतामणि गणेश के साथ ही इच्छापूर्ण और चिंताहरण गणेशजी की प्रतिमाएं है।

ऐसी मान्यता है कि इस मंदिर में ली गई मनोतियां अवश्य ही पूर्ण होती हैं। यहां पर दूर-दूर से लोग दर्शन करने आते हैं। यह मंदिर नगर से लगभग 7 किलोमीटर दूरी पर स्थित है।

श्री हरसिध्दिदेवी का मंदिर-

उज्जैन नगर के प्राचीन और महत्वपूर्ण धार्मिक स्थलों में हरसिध्दिदेवी का मंदिर प्रमुख है। स्कंद पुराण में वर्णन है कि शिवजी के कहने पर मां भगवती ने दुष्ट दानवों का वध किया था अत: तब से ही उनका नाम हरसिद्धि नाम से प्रसिद्ध हुआ। शिवपुराण के अनुसार सती की कोहनी यहीं पर गिरी थी अतएव तांत्रिक ग्रंथों में इसे सिद्ध शक्तिपीठ की संज्ञा दी गई है। यह देवी, सम्राट विक्रमादित्य की आराध्य कुलदेवी भी कही जाती है। 

कहते हैं कि सम्राट विक्रमादित्य ने यहां पर घोर तपस्या की थी तथा लगातार 11 बार अपना सिर काटकर इन्हें समर्पित किया था और ग्यारह बार सिर पुन: उनके शरीर से जुड़ गया था। उपरोक्त तथ्‍यों के कारण इस मंदिर का अपना विशिष्ट महत्व है।

इस मंदिर के गर्भगृह में श्रीयंत्र प्रतिष्ठित है। ऊपर श्री अन्नपूर्णा तथा उनके आसन के नीचे कालिका, महालक्ष्मी तथा महासरस्वती आदि देवियों की प्रतिमाएं हैं। रुद्रसागर तालाब के निकट इस मंदिर के परकोटे में चारों ओर द्वार हैं। इस मंदिर के प्रांगण में दो विशाल दीप स्तंभ हैं जिन पर नवरात्रि में दीपक जलाए जाते हैं। इसके कोने पर एक अतिप्राचीन बावड़ी भी है। इस मंदिर के पीछे संतोषी माता एवं अगस्त्येश्वर महादेव का मंदिर है। स्कंदपुराण में उल्लेख है कि इस मंदिर के दर्शन से अपार पुण्य प्राप्त होता है।

 श्री गोपाल मंदिर—

गोपाल मंदिर उज्जैन नगर का दूसरा सबसे बड़ा मंदिर है। यह मंदिर नगर के मध्य व्यस्ततम क्षेत्र में स्थित है। इस मंदिर का निर्माण महाराजा श्री दौलतरावजी सिंधिया की महारानी  बायजा बाई द्वारा लगभग 1833 के आसपास कराया गया था। नगर के मध्य स्थित इस मंदिर में द्वारकाधीश (भगवान कृष्ण) की अत्यंत मनोहारी मूर्ति है। मंदिर के गर्भगृह में लगा रत्नजड़ित द्वार श्रीमंत सिंधिया ने गजनी से प्राप्त किया था, जो सोमनाथ मंदिर की लूट के साथ ही वहां पहुंच गया था। इस भव्य मंदिर का शिखर सफेद संगमरमर से एवं शेष भाग सुंदर काले पत्थरों से निर्मित है। मंदिर का प्रांगण तथा परिक्रमा पथ भव्य और विशाल है।

जन्माष्टमी के अवसर पर यहां पर विशेष आयोजन किया जाता है। वैकुंठ चौदस के दिन महाकाल की सवारी मध्यरात्रि के समय हरि-हर मिलन हेतु यहां पर पधारती है एवं भस्मपूजन के समय श्री गोपालकृष्ण की सवारी महाकालेश्वर पहुंचती है तथा वहां पर उन्हें तुलसी-दल अर्पित किया जाता है। ऐसा अद्वितीय संयोग अन्यत्र कहीं पर भी उपलब्ध नहीं है। इस मंदिर में प्रवचन, भजन एवं कीर्तन के कार्यक्रम सदैव चलते रहते हैं तथा यहां का वातावरण अनवरत भक्तिमय बना रहता है।

श्रीराम-जनार्दन मंदिर-

उज्जैन स्थित श्रीराम –जनार्दन मंदिर भी दर्शनीय एवं ऐतिहासिक महत्व से परिपूर्ण है । इसका निर्माण राजा जयसिंह दवारा किया गया है। यह मंदिर प्राचीन विष्णुसागर के तट पर स्थित है।

इस मंदिर में 11वीं शताब्दी में बनी शेषशायी विष्णु की तथा 10 वीं शताब्दी में निर्मित गोवर्धनधारी कृष्ण की प्रतिमाएं भी लगी हैं । यहां पर श्रीराम लक्ष्मण एंव जानकीजी की प्रतिमाएं बनवासी वेशभूषा में उपस्थित हैं।

श्री गढ़कालिका देवी मंदिर-

गढ़कालिका देवी को महाकवि कालिदास की आराध्य देवी माना जाता है। उनकी अनुकंपा से ही अल्पज्ञ का‍लिदास को विद्वता प्राप्त हुई थी। तांत्रिक दृष्टिकोण से यह एक सिद्धपीठ है। त्रिपुरा माहात्म्य के अनुसार देश के 12 प्रमुख शक्तिपीठों में यह 6ठा स्थान इस मंदिर का ही है। यह मंदिर जिस स्थान पर स्थित है, वहां कभी प्राचीन अवन्तिका नगरी बसी हुई थी। गढ़ पर स्थित होने से ये गढ़कालिका कहलायी। 

उक्त मंदिर में कालिकाजी के एक तरु श्री महालक्ष्मीजी हैं और दूसरी तरफ महासरस्वतीजी की प्रतिमा स्थित है। यहां से कुछ दूरी पर ही शिप्रा नदी है, वहीं पर सतियों का स्थान भी है। उसके सामने ओखर श्मशान घाट है। पौराणिक दृष्टिकोण से गढ़कालिका मंदिर का विशेष महत्व है। यहां पर श्री दुर्गाशप्तशती का पाठ करने से आध्यात्मिक प्रगति होती है। यहां न‍वरात्रि पर्व पर विशेष आयोजन होते हैं।

श्री काल भैरव मंदिर-

काल भैरव मंदिर आज के उज्जैन नगर में स्थित प्राचीन अवंतिका नगरी के क्षेत्र में स्थित है। अष्ट भैरवों में प्रमुख श्री कालभैरव का यह मंदिर अत्यंत प्राचीन और चमत्कारिक है। इस मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि भैरव प्रतिमा के मुंह में छिद्र न होते हुए भी यह प्रतिमा मदिरापान करती है। जब पुजारी द्वारा मद्य पात्र भगवान भैरवजी के मुंह से लगाया जाता है, तो सबके देखते ही देखते यह पात्र स्वत: ही खाली हो जाता है।

भैरवगढ़ के दक्षिण में तथा शिप्रा नदी के तट पर श्री कालभैरव का यह चमत्कारिक मंदिर स्थित है। कालभैरव के दक्षिण में करभेश्वर महादेव एवं विक्रांत भैरव के स्थान हैं। स्कंद पुराण में इसी कालभैरव मंदिर का अवंतिका खंड में वर्णन मिलता है। इनके नाम से ही यह क्षेत्र भैरवगढ़ कहलाता है। राजा भद्रसेन द्वारा इस मंदिर का निर्माण कराया गया था। उसके भग्न होने पर राजा जयसिंह ने इसका जीर्णोद्धार करवाया। इस मंदिर के प्रांगण में स्थित एक संकरी और गहरी गुफा में पाताल भैरवी का मंदिर है। यह स्थान तांत्रिक साधना हेतु विशेष महत्वपूर्ण है।

श्री चारधाम मंदिर-

यह आधुनिक मंदिर श्री हरसिद्धिदेवी मंदिर की दक्षिण दिशा में स्थित है। स्वामी शांति स्वरूपानंदजी तथा युगपुरूष स्वामी परमानंदजी महाराज के सद्प्रयत्नों से इस मंदिर की स्थापना अखंड आश्रम परिसर में हुई।

स्मरण रहे कि श्री द्वारकाधाम एवं श्री जगन्नाथ धाम की सन् 1997 में तथा श्री रामेश्वरधाम की सन् 1999 में प्राण-प्रतिष्ठा हुई थी, ज‍बकि चौथे धाम श्री ब‍द्रीविशाल की प्राण-प्रतिष्ठा सन् 2001 में हुई है।

उक्त प्रतिमाओं की विशेषता यह है कि इन्हें  स्वाभाविक मूल स्वरूप ही प्रदान किया गया ताकि दर्शनार्थियों को यथार्थ दर्शन के लाभ प्राप्त हो सकें। एक ही परिसर में चारों धामों के दर्शन को प्राप्त करना प्राय: दुर्लभ संयोग ही होता है।

इस परिसर के प्रवेश द्वार पर ही एक सुंदर बगीचा है एवं इसके  पार्श्वभाग में संत निवास तथा साधना कक्ष स्‍थित है। यहां पर समय-समय पर संत-महात्माओं के प्रवचन एवं सत्संग आदि कार्यक्रम आयोजित होते रहते हैं। यह मंदिर कॉम्प्लेक्स अपनी विशिष्ट शैली का एक अनूठा उदाहरण है।

मंगलनाथ मंदिर-

पुराणों के अनुसार उज्जैन नगरी को मंगल ग्रह की जननी कहा जाता है। ऐसे व्यक्ति जिनकी कुंडली में मंगल भारी रहता है, वे अपने अनिष्ट ग्रहों की शांति के लिए यहां पूजा-पाठ करवाने आते हैं। यूं तो देश में मंगल भगवान के कई मंदिर हैं, लेकिन उज्जैन इनका जन्म स्थान होने के कारण यहां की पूजा को खास महत्व दिया जाता है। कहा जाता है कि यह मंदिर सदियों पुराना है। सिंधिया राजघराने में इसका पुनर्निर्माण करवाया गया था। उज्जैन शहर को भगवान महाकाल की नगरी कहा जाता है, इसलिए यहां मंगलनाथ भगवान की शिवरूपी प्रतिमा का पूजन किया जाता है। मत्स्य पुराण में मंगल ग्रह को भू‍‍मि-पुत्र कहा गया है।

मंगल ग्रह की शांति, शिव कृपा ऋणमुक्ति तथा धन प्राप्ति हेतु श्री मंगलनाथजी की प्राय: उपासना की जाती है। यहां पर भात-पूजा तथा रुद्राभिषेक करने का विशेष महत्व है। मंगलवार के दिन यहां पर दर्शनार्थियों की संख्या अपेक्षाकृत अधिक होती है। ज्योतिष एवं खगोल‍ विज्ञान के दृष्टिकोण से यह स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है।

यह मंदिर उंचे टीले पर बना हुआ है। इसके प्रांगण में पृथ्वी देवी की अत्यंत प्राचीन प्रतिमा स्थापित है। शक्तिस्वरूपा होने के कारण इन्हें सिंदूर का चोला चढ़ाया जाता है। यहां से थोड़ी दूरी पर गंगा घाट है। यह वही स्थान है, जहां पर कभी भगवान श्रीकृष्ण ने अपने गुरु महर्षि सांदीपनि की गंगा स्नान करने की अभिलाषा को पूर्ण करने हेतु श्री गंगाजी को प्रकट किया था।

श्री नवग्रह मंदिर (शनि मंदिर)- 

उज्जैन शहर से लगभग 6 किलोमीटर दूर इंदौर-उज्जैन मार्ग पर त्रिवेणी संगम तीर्थ स्थल है। यहां पर नवग्रहों का अत्यंत प्राचीन मंदिर है। स्कंद पुराण में इसे शनिदेव के महत्वपूर्ण स्थान के रूप में मान्यता दी गई है। प्रति शनैश्चरी अमावस्या को यहां पर असंख्य श्रध्दालु दर्शन हेतु आते हैं।

कालियादेह महल-

उज्जैन नगर के प्राचीन और महत्वपूर्ण स्थलो में कालियादेह महल जो आज सूर्य मंदिर के नाम से जाना जाता है। भैरव गढ़ से 3 किलोमीअर की दूरी पर शिप्रा नदी के पास स्थित है। मुगल शासक मुहम्मद खिलजी ने 1458 में इस महल का निर्माण करवाया था। मांडू के सुल्तान ने यहां 52 कुंडों का निर्माण करवाया।

महल के पीछे से बहती शिप्रा नदी की धारा दो भागों में बंटकर उसका जल प्रवाह इन कुंडों में किया गया। आज भी वर्षा ऋतु में कल-कल की ध्वनि से इन कुंडों से व कुंडों की घुमावदार नालियों से बहता पानी पर्यटकों को सहज ही अपनी ओर आकर्षित करता है।

वेदशाला-

ज्योतिष शास्त्र के अनुसार से यह स्थल अत्यंत महत्वपूर्ण है। इस वेधशाला का निर्माणस सन् 1730 में जयसिंह ने करवाया था। सन् 1923 में महाराजा माधवराव सिंधिया ने इसका जीर्णोद्धार करवाया।

सम्राट यंत्र, रिगंश यंत्र, नाड़ी वलय यंत्र तथा भित्ति यंत्र आदि यहां के प्रमुख यंत्र हैं। खगोल अध्ययन के लिए यह स्थान अत्यंत उपयोगी है।

श्री भर्तृहरि गुफा-

भर्तृहरि की गुफा गढ़कालिका के दक्षिण में स्थित है। सम्राट विक्रमादित्य के बड़े भाई राजा भर्तृहरि की साधना-स्थली होने के कारण यह स्थान प्रसिद्ध है। राज-पाट त्यागने के पश्चात उन्होंने नाथ पंथ की दीक्षा लेकर कई वर्षों तक यहां पर घनघोर योग-साधना की थी।

उज्जैन में शिप्रा तट पर स्थित यह गुफा, बौध्द एवं परमार कालीन स्थापत्य कला की संरचना है।। इसका प्रवेश मार्ग तुलनात्मक रूप से संकरा है तथा भीतरी दक्षिणी भाग में गोपीचंदजी की प्रतिमा है। राजयोगी भर्तृहरि की धूनी के ऊपर की शिला पर हाथ के पंजे के निशान हैं। कहा जाता है कि भर्तृहरि की तपस्या से इंद्र डर गया था और उनकी तपस्या को भंग करने के लिए उसने एक शिला फेंकी जिसे भर्तृहरि ने अपना हाथ ऊपर करके वहीं रोक दिया था। अत: भर्तृहरि के हाथ का निशान इस शिला पर अंकित हो गया। किंवदंती है कि पहले इस गुफा के अंदर से ही चारों धामों तक जाने के रास्ते थे, जो आजकल बंद हैं। इस गुफा की व्यवस्था नाथपंथी साधुगण करते हैं। यहां से कुछ दूर पर नागपंथ के प्रमुख आचार्य मत्स्येन्द्रनाथजी की समाधि है। उनको पीर मछंदरनाथ भी कहते हैं।

श्री सांदीपनि आश्रम-

अंकपात क्षेत्र में स्थित इस आश्रम में भगवान श्रीकृष्ण-सुदामा और बलरामजी ने अपने गुरू श्री सांदीपनि ऋषि के सान्निध्य में रहकर गुरूकुल परंपरानुसार विद्याध्ययन कर 14 विद्याएं तथा 64 कलाएं सीखी थीं। उस काल में तक्षशिला और नालंदा की तरह उज्जैन (अवन्तिका) भी ज्ञान-विज्ञान और संस्कृति का सुप्रसिद्ध केंद्र था।  ऐसा कहा जाता है कि भगवान श्रीकृष्ण यहां स्लेअ पर लिखे अंक धोकर मिटाते थे इसलिए ही इस क्षेत्र का नाम अंकपात पड़ा।

श्रीमद्भागवत,महाभारत तथा कई अन्य पुराणों में यहां का वर्णन है।  यहां पर स्‍थित कुंड में भगवान श्रीकृष्ण ने अपने गुरुजी को स्नानार्थ गोमती नदी का जल उपलब्ध करवाया था अतएव यह सरोवर गोमती कुंड कहलाया। यहां पर स्थित मंदिर में श्रीकृष्ण, बलराम तथा सुदामाजी की सुंदर म‍ूर्तियां हैं। महर्षि सांदीपनि के वंशज अभी भी उज्जैन में निवास करते हैं तथा प्रख्यात ज्योतिर्विद के रूप में जाने जाते हैं। इसी अंकपात क्षेत्र में सिंहस्थ महाकुंभ का मेला लगता है तथा यह ऐतिहासिक एवं पुरा‍तात्विक दृष्टिकोण से भी प्रमुख स्थान है।

नगरकोट की रानी-

नगरकोट की रानी प्राचीन उज्जयिनी के दक्षिण-पश्चिम कोने की सुरक्षा देवी है। यह स्थान पुरातत्व की दृष्टि से प्रमुख है। राजा विक्रमादित्य और राजा भर्तृहरि की अनेक कथाएं इस स्थान से संबध्द हैं।

यह स्थान नाथ संप्रदाय की परंपरा से जुड़ा है। मंदिर के सामने एक कुंड है, जो परमारकालीन है। कुंड के दोनों ओर दो छोटे मंदिर हैं। एक मंदिर में गुप्तकालीन कार्तिकेय की प्रतिमा है। यह स्थान नगर के प्राचीन कच्चे परकोटे पर स्थित है इसलिए इसे नगरकोट की रानी कहा कहा जाता है।

Related posts

माँ बगलामुखी का प्राचीन मंदिर

admin

यहां उगते हैं एक साथ 3 सूर्य, हजार वर्ष का एक साल

admin

उत्तरकाण्ड:भाग-एक 

admin

Leave a Comment