धर्म आस्था

रामायण काल के 10 मायावी राक्षस

प्राचीनकाल में सुर, असुर, देव, दानव, दैत्य, रक्ष, यक्ष, दक्ष,
किन्नर, निषाद, वानर, गंधर्व, नाग आदि जातियां होती थीं। राक्षसों को पहले
‘रक्ष’ कहा जाता था। ‘रक्ष’ का अर्थ, जो समाज की रक्षा करें। राक्षस लोग
पहले रक्षा करने के लिए नियुक्त हुए थे, लेकिन बाद में इनकी प्रवृत्तियां
बदलने के कारण ये अपने कर्मों के कारण बदनाम होते गए और आज के संदर्भ में
इन्हें असुरों और दानवों जैसा ही माना जाता है।
देवताओं की उत्पत्ति अदिति से, असुरों की दिति से, दानवों की दनु,
कद्रू से नाग की मानी गई है। पुराणों के अनुसार कश्यप की सुरसा नामक रानी
से यातुधान (राक्षस) उत्पन्न हुए, लेकिन एक कथा के अनुसार प्रजापिता
ब्रह्मा ने समुद्रगत जल और प्राणियों की रक्षा के लिए अनेक प्रकार के
प्राणियों को उत्पन्न किया। उनमें से कुछ प्राणियों ने रक्षा की जिम्मेदारी
संभाली, तो वे राक्षस कहलाए और जिन्होंने यक्षण (पूजन) करना स्वीकार किया,
वे यक्ष कहलाए। जल की रक्षा करने के महत्वपूर्ण कार्य को संभालने के लिए
यह जाति पवित्र मानी जाती थी।

राक्षसों का प्रतिनिधित्व इन दोनों लोगों को सौंपा गया- ‘हेति’ और
‘प्रहेति’। ये दोनों भाई थे। ये दोनों भी दैत्यों के प्रतिनिधि मधु और कैटभ
के समान ही बलशाली और पराक्रमी थे। प्रहेति धर्मात्मा था तो हेति को
राजपाट और राजनीति में ज्यादा रुचि थी।
रामायणकाल में जहां विचित्र तरह के मानव और पशु-पक्षी होते थे वहीं उस काल
में राक्षसों का आतंक बहुत ज्यादा बढ़ गया था। राक्षसों में मायावी
शक्तियां होती थीं। वे अपनी शक्ति से देव और मानव को आतंकित करते रहते थे।
रामायणकाल में संपूर्ण दक्षिण भारत और दंडकारण्य क्षेत्र (मध्यप्रदेश,
छत्तीसगढ़) पर राक्षसों का आतंक था। दंड नामक राक्षस के कारण ही इस क्षेत्र
का नाम दंडकारण्य पड़ा था। आओ जानते हैं राम के काल के वे 10 राक्षस,
जिनका डंका बजता था।
अगले पन्ने पर राक्षसों की शुरुआत का परिचय…
पहले राक्षस ‘हेति’
और ‘प्रहेति’ : राक्षसों का प्रतिनिधित्व दो लोगों को सौंपा गया- ‘हेति’
और ‘प्रहेति’। ये दोनों भाई थे। हेति ने अपने साम्राज्य विस्तार हेतु ‘काल’
की पुत्री ‘भया’ से विवाह किया। भया से उसके विद्युत्केश नामक एक पुत्र का
जन्म हुआ। उसका विवाह संध्या की पुत्री ‘सालकटंकटा’ से हुआ। माना जाता है
कि ‘सालकटंकटा’ व्यभिचारिणी थी। इस कारण जब उसका पुत्र जन्मा तो उसे
लावारिस छोड़ दिया गया। विद्युत्केश ने भी उस पुत्र की यह जानकर कोई परवाह
नहीं की कि यह न मालूम किसका पुत्र है। बस यहीं से राक्षस जाति में बदलाव
आया…।
शिव और मां पार्वती की उस अनाथ बालक पर नजर पड़ी और उन्होंने उसको सुरक्षा
प्रदान ‍की। उस अबोध बालक को त्याग देने के कारण मां पार्वती ने शाप दिया
कि अब से राक्षस जाति की स्त्रियां जल्द गर्भ धारण करेंगी और उनसे उत्पन्न
बालक तत्काल बढ़कर माता के समान अवस्था धारण करेगा। इस शाप से राक्षसों में
शारीरिक आकर्षण कम, विकरालता ज्यादा रही। शिव और पार्वती ने उस बालक का
नाम ‘सुकेश’ रखा। शिव के वरदान के कारण वह निर्भीक था। वह निर्भीक होकर
कहीं भी विचरण कर सकता था। शिव ने उसे एक विमान भी दिया था।
अगले पन्ने पर राम के काल के पहले तीन मायावी राक्षस
सुकेश के 3 पुत्र : सुकेश ने गंधर्व कन्या देववती से विवाह किया। देववती से सुकेश के 3 पुत्र हुए- 1. माल्यवान, 2. सुमाली और 3. माली। इन तीनों के कारण राक्षस जाति को विस्तार और प्रसिद्धि प्राप्त हुई।
इन तीनों भाइयों ने शक्ति और ऐश्वर्य प्राप्त करने के लिए ब्रह्माजी की
घोर तपस्या की। ब्रह्माजी ने इन्हें शत्रुओं पर विजय प्राप्त करने और तीनों
भाइयों में एकता और प्रेम बना रहने का वरदान दिया। वरदान के प्रभाव से ये
तीनों भाई अहंकारी हो गए।
तीनों भाइयों ने मिलकर विश्वकर्मा से त्रिकूट पर्वत के निकट समुद्र तट पर
लंका का निर्माण कराया और उसे अपने शासन का केंद्र बनाया। इस तरह उन्होंने
राक्षसों को एकजुट कर राक्षसों का आधिपत्य स्थापित किया और उसे राक्षस जाति
का केंद्र भी बनाया।
लंका को उन्होंने धन और वैभव की धरती बनाया और यहां तीनों राक्षसों ने
राक्षस संस्कृति के लिए विश्व विजय की कामना की। उनका अहंकार बढ़ता गया और
उन्होंने यक्षों और देवताओं पर अत्याचार करना शुरू किया जिससे संपूर्ण धरती
पर आतंक का राज कायम हो गया।
इन्हीं तीनों भाइयों के वंश में आगे चलकर राक्षस जाति का विकास हुआ। तीनों
भाइयों के वंशज में माल्यवान के वज्र, मुष्टि, धिरूपार्श्व, दुर्मख,
सप्तवहन, यज्ञकोप, मत्त, उन्मत्त नामक पुत्र और अनला नामक कन्या हुई।
सुमाली के प्रहस्त, अकन्पन, विकट, कालिकामुख, धूम्राश, दण्ड, सुपार्श्व,
सहादि, प्रधस, भास्कण नामक पुत्र तथा रांका, पुण्डपोत्कटा, कैकसी, कुभीनशी
नामक पुत्रियां हुईं। इनमें से कैकसी रावण की मां थीं। माली रावण के नाना
थे। रावण ने इन्हीं के बलबूते पर अपने साम्राज्य का विस्तार किया और
शक्तियां बढ़ाईं।
माली के अनल, अनिल, हर और संपात्ति नामक 4 पुत्र हुए। ये चारों पुत्र रावण
की मृत्यु पश्चात विभीषण के मंत्री बने थे। रावण राक्षस जाति का नहीं था,
उसकी माता राक्षस जाति की थी लेकिन उनके पिता यक्ष जाति के ब्राह्मण थे।
अगले पन्ने पर दूसरा मायावी राक्षस…
राक्षसराज रावण :  माली की पुत्री कैकसी रावण की माता
थीं। रावण का अपने नाना की ओर झुकाव ज्यादा था इसलिए उसने देवों को छोड़कर
राक्षसों की उन्नति के बारे में ज्यादा सोची। रावण एक कुशल राजनीतिज्ञ,
सेनापति और वास्तुकला का मर्मज्ञ होने के साथ-साथ ब्रह्मज्ञानी तथा
बहु-विद्याओं का जानकार था। राक्षसों के प्रति उसके लगाव के चलते उसे
राक्षसों का मुखिया घोषित कर दिया गया था। रावण ने लंका को नए सिरे से
बसाकर राक्षस जाति को एकजुट किया और फिर से राक्षस राज कायम किया। उसने लंका को कुबेर से छीना था।
उसे मायावी इसलिए कहा जाता था कि वह इंद्रजाल, तंत्र, सम्मोहन और तरह-तरह
के जादू जानता था। उसके पास एक ऐसा विमान था, जो अन्य किसी के पास नहीं था।
इस सभी के कारण सभी उससे भयभीत रहते थे।
मान्यता अनुसार एक शाप के चलते असुरराज विष्णु के पार्षद जय और विजय ने ही
रावण और कुंभकर्ण के रूप में फिर से जन्म लेकर धरती पर अपना साम्राज्य
स्थापित किया। द्वापर युग में यही दोनों शिशुपाल व दंतवक्त्र नाम के
अनाचारी के रूप में पैदा हुए थे। इनको 3 जन्मों की सजा थी।
रावण ने रक्ष संस्कृति का विस्तार किया था। रावण ने कुबेर से लंका और उनका
विमान छीना। रावण ने राम की सीता का हरण किया और अभिमानी रावण ने शिव का
अपमान किया था। विद्वान होने के बावजूद रावण क्रूर, अभिमानी, दंभी और
अत्याचारी था।
अगले पन्ने पर तीसरा मायावी राक्षस…
कालनेमि : कालनेमि राक्षस रावण
का विश्वस्त अनुचर था। यह भयंकर मायावी और क्रूर था। इसकी प्रसिद्धि
दूर-दूर तक थी। रावण ने इसे एक बहुत ही कठिन कार्य सौंप दिया था।
जब राम-रावण युद्ध में लक्ष्मण को शक्ति लगने से वे बेहोश हो गए थे, तब
हनुमान को तुरंत ही संजीवनी लाने का कहा गया था। हनुमानजी जब द्रोणाचल की
ओर चले तो रावण ने उनके मार्ग में विघ्न उपस्थित करने के लिए कालनेमि को
भेजा।
कालनेमि ने अपनी माया से तालाब, मंदिर और सुंदर बगीचा बनाया और वह वहीं एक
ऋषि का वेश धारण कर मार्ग में बैठ गया। हनुमानजी उस स्थान को देखकर वहां
जलपान के लिए रुकने का मन बनाकर जैसे ही तालाब में उतरे तो तालाब में
प्रवेश करते ही एक मगरी ने अकुलाकर उसी समय हनुमानजी का पैर पकड़ लिया।
हनुमानजी ने उसे मार डाला। फिर उन्होंने अपनी पूंछ से कालनेमि को जकड़कर
उसका वध कर दिया।
अगले पन्ने पर चौथा मायावी राक्षस…
सुबाहु : ताड़का के पिता का नाम सुकेतु यक्ष और पति का नाम सुन्द था। सुन्द एक राक्षस था
इसलिए यक्ष होते हुए भी ताड़का राक्षस कहलाई। अगस्त्य मुनि के शाप के चलते
इसका सुंदर चेहरा कुरूप हो गया था इसलिए उसने ऋषियों से बदला लेने की ठानी
थी। वह आए दिन अपने पुत्रों के साथ मुनियों को सताती रहती थी।
यह अयोध्या के समीप स्थित सुंदर वन में अपने पति और दो पुत्रों सुबाहु और
मारीच के साथ रहती थी। ताड़का के शरीर में हजार हाथियों का बल था। उसके
कारण ही सुंदर वन को पहले ताड़का वन कहा जाता था। सुबाहु भी भयंकर था और वह
प्रतिदिन ऋषियों के यज्ञ में उत्पात मचाता था।
उसी वन में विश्वामित्र सहित अनेक ऋषि-मुनि तपस्या करते थे। ये सभी
राक्षसगण हमेशा उनकी तपस्या में बाधाएं खड़ी करते थे। विश्वामित्र एक यज्ञ
के दौरान राजा दशरथ से अनुरोध कर एक दिन राम और लक्ष्मण को अपने साथ सुंदर
वन ले गए। राम ने ताड़का का और विश्वामित्र के यज्ञ की पूर्णाहूति के दिन
सुबाहु का भी वध कर दिया था। राम के बाण से मारीच आहत होकर दूर दक्षिण में
समुद्र तट पर जा गिरा।
अगले पन्ने पर पांचवां मायावी राक्षस…
मारीच : राम के तीर से बचने के बाद ताड़का पुत्र मारीच
ने रावण की शरण ली। मारीच लंका के राजा रावण का मामा था। जब शूर्पणखा ने
रावण को अपने अपमान की कथा सुनाई तो रावण ने सीताहरण की योजना बनाई।
सीताहरण के दौरान रावण ने मारीच की मायावी बुद्धि की सहायता ली।
रावण महासागर पार करके गोकर्ण तीर्थ में पहुंचा, जहां राम के डर के कारण
मारीच छिपा हुआ था। वह रावण का पूर्व मंत्री रह चुका था। रावण को देखकर
मारीच ने कहा कि राक्षसराज ऐसी क्या आवश्यकता आ पड़ी, जो आपको मेरे पास आना
पड़ा।
रावण ने गुस्से से भरकर कहा कि राम-लक्ष्मण ने शूर्पणखा के नाक-कान काट
दिए और अब हमें उनसे बदला लेना होगा। मारीच ने कहा- हे रावण,
श्रीरामचंद्रजी के पास जाने में तुम्हारा कोई लाभ नहीं है। मैं उनका
पराक्रम जानता हूं। भला इस जगत में ऐसा कौन है, जो उनके बाणों के वेग को सह
पाए।
रावण ने मारीच पर क्रोधित होकर कहा कहा- रे मामा! तू मेरी बात नहीं मानेगा
तो निश्चय ही तुझे अभी मौत के घाट उतार दूंगा। मारीच ने मन ही मन सोचा-
यदि मृत्यु निश्चित है तो श्रेष्ठ पुरुष के ही हाथ से मरना अच्छा होगा।
फिर मारीच ने पूछा- अच्छा बताओ, मुझे क्या करना होगा? रावण ने कहा- तुम एक
सुंदर हिरण का रूप बनाओ जिसके सींग रत्नमय प्रतीत हो। शरीर भी
चित्र-विचित्र रत्नों वाला ही प्रतीत हो। ऐसा रूप बनाओ कि सीता मोहित हो
जाए। अगर वे मोहित हो गईं तो जरूर वो राम को तुम्हें पकड़ने भेजेंगी। इस
दौरान मैं उसे हरकर ले जाऊंगा। मारीच ने रावण के कहे अनुसार ही कार्य किया
और रावण अपनी योजना में सफल रहा। इधर राम के बाण से मारीच मारा गया।
अगले पन्ने पर छठा मायावी राक्षस…
कुंभकर्ण : यह रावण का भाई था, जो 6 महीने बाद 1
द‌िन जागता और भोजन करके फ‌िर सो जाता, क्‍योंक‌ि इसने ब्रह्माजी से
न‌िद्रासन का वरदान मांग ल‌िया था। युद्ध के दौरान क‌िसी तरह कुंभकर्ण को
जगाया गया। कुंभकर्ण ने युद्घ में अपने व‌िशाल शरीर से वानरों पर प्रहार
करना शुरू कर द‌िया इससे राम की सेना में हाहाकार मच गया।
सेना का मनोबल बढ़ाने के ल‌िए राम ने कुंभकर्ण को युद्घ के ल‌िए ललकारा और भगवान राम के हाथों कुंभकर्ण वीरगत‌ि को प्राप्त हुआ।
अगले पन्ने पर सातवां मायावी राक्षस…
कबंध : सीता की खोज में लगे राम-लक्ष्मण को दंडक वन में
अचानक एक विचित्र दानव दिखा जिसका मस्तक और गला नहीं थे। उसकी केवल एक ही
आंख ही नजर आ रही थी। वह विशालकाय और भयानक था। उस विचित्र दैत्य का नाम
कबंध था।
कबंध ने राम-लक्ष्मण को एकसाथ पकड़ लिया। राम और लक्ष्मण ने कबंध की दोनों
भुजाएं काट डालीं। कबंध ने भूमि पर गिरकर पूछा- आप कौन वीर हैं? परिचय
जानकर कबंध बोला- यह मेरा भाग्य है कि आपने मुझे बंधन मुक्त कर दिया। कबंध
ने कहा- मैं दनु का पुत्र कबंध बहुत पराक्रमी तथा सुंदर था। राक्षसों जैसी
भीषण आकृति बनाकर मैं ऋषियों को डराया करता था इसीलिए मेरा यह हाल हो गया
था।
अगले पन्ने पर आठवां मायावी राक्षस…
विराध : विराध दंडकवन का था।
सीता और लक्ष्मण के साथ राम ने दंडक वन में प्रवेश किया। वहां पर उन्हें
ऋषि-मुनियों के अनेक आश्रम दृष्टिगत हुए। राम उन्हीं के आश्रम में रहने
लगे। ऋषियों ने उन्हें एक राक्षस के उत्पात की जानकारी दी। राम ने उन्हें
निर्भीक किया।
वहां से उन्होंने महावन में प्रवेश किया, जहां नाना प्रकार के हिंसक पशु
और नरभक्षक राक्षस निवास करते थे। ये नरभक्षक राक्षस ही तपस्वियों को कष्ट
दिया करते थे। कुछ ही दूर जाने के बाद बाघम्बर धारण किए हुए एक पर्वताकार
राक्षस दृष्टिगत हुआ। वह राक्षस हाथी के समान चिंघाड़ता हुआ सीता पर झपटा।
उसने सीता को उठा लिया और कुछ दूर जाकर खड़ा हो गया।
उसने राम और लक्ष्मण पर क्रोधित होते हुए कहा- तुम धनुष-बाण लेकर दंडक वन
में घुस आए हो। तुम दोनों कौन हो? क्या तुमने मेरा नाम नहीं सुना? मैं
प्रतिदिन ऋषियों का मांस खाकर अपनी क्षुधा शांत करने वाला विराध हूं।
तुम्हारी मृत्यु ही तुम्हें यहां ले आई है। मैं तुम दोनों का अभी रक्तपान
करके इस सुन्दर स्त्री को अपनी पत्नी बनाऊंगा।
विराध ने हंसते हुए कहा- यदि तुम मेरा परिचय जानना ही चाहते हो तो सुनो!
मैं जय राक्षस का पुत्र हूं। मेरी माता का नाम शतह्रदा है। मुझे ब्रह्माजी
से यह वर प्राप्त है कि किसी भी प्रकार का अस्त्र-शस्त्र न तो मेरी हत्या
ही कर सकती है और न ही उनसे मेरे अंग छिन्न-भिन्न हो सकते हैं। यदि तुम इस
स्त्री को मेरे पास छोड़कर चले जाओगे तो मैं तुम्हें वचन देता हूं कि मैं
तुम्हें नहीं मारूंगा।
राम और लक्ष्मण ने उससे घोर युद्ध किया और उसे हर तरह से घायल कर दिया।
फिर उसकी भुजाएं भी काट दीं। तभी राम बोले- लक्ष्मण! वरदान के कारण यह
दुष्ट मर नहीं सकता इसलिए यही उचित है कि हमें भूमि में गड्ढा खोदकर इसे
बहुत गहराई में गाड़ देना चाहिए।
लक्ष्मण गड्ढा खोदने लगे और राम विराध की गर्दन पर पैर रखकर खड़े हो गए। तब
विराध बोला- हे प्रभु! मैं तुम्बुरू नाम का गंधर्व हूं। कुबेर ने मुझे
राक्षस होने का शाप दिया था। मैं शाप के कारण राक्षस हो गया था। आज आपकी
कृपा से मुझे उस शाप से मुक्ति मिल रही है। राम और लक्ष्मण ने उसे उठाकर
गड्ढे में डाल दिया और गड्ढे को पत्थर आदि से पाट दिया।
अगले पन्ने पर नौवां मायावी राक्षस…
अहिरावण : अहिरावण एक असुर था। अहिरावण पाताल में स्थित
रावण का मित्र था जिसने युद्ध के दौरान रावण के कहने से आकाश मार्ग से राम
के शिविर में उतरकर राम-लक्ष्मण का अपहरण कर लिया था।
जब अहिरावण श्रीराम और लक्ष्मण को देवी के समक्ष बलि चढ़ाने के लिए विभीषण
के भेष में राम के शिविर में घुसकर अपनी माया के बल पर पाताल ले आया था,
तब श्रीराम और लक्ष्मण को मुक्त कराने के लिए हनुमानजी पाताल लोक पहुंचे और
वहां उनकी भेंट उनके ही पुत्र मकरध्वज से हुई। उनको मकरध्वज के साथ लड़ाई
लड़ना पड़ी, क्योंकि मकरध्वज अहिरावण का द्वारपाल था।
मकरध्वज ने कहा- अहिरावण का अंत करना है तो इन 5 दीपकों को एकसाथ एक ही
समय में बुझाना होगा। यह रहस्य ज्ञात होते ही हनुमानजी ने पंचमुखी हनुमान
का रूप धारण किया। उत्तर दिशा में वराह मुख, दक्षिण दिशा में नरसिंह मुख,
पश्चिम में गरूड़ मुख, आकाश की ओर हयग्रीव मुख एवं पूर्व दिशा में हनुमान
मुख। इन 5 मुखों को धारण कर उन्होंने एकसाथ सारे दीपकों को बुझाकर अहिरावण
का अंत किया और श्रीराम-लक्ष्मण को मुक्त किया।
हनुमानजी ने अहिरावण का वध कर प्रभु श्रीराम और लक्ष्मण को मुक्त कराया और
मकरध्वज को पाताल लोक का राजा नियुक्त करते हुए उसे धर्म के मार्ग पर चलने
की प्रेरणा दी।
अगले पन्ने पर दसवां मायावी राक्षस…
खर और दूषण : ये दोनों रावण के ‘विमातृज’ (सौतेले
भाई) थे। ऋषि विश्रवा की 2 और पत्नियां थीं। खर, पुष्पोत्कटा से और दूषण,
वाका से उत्पन्न हुए थे जबकि कैकसी से रावण का जन्म हुआ था। खर-दूषण को भगवान राम ने मारा था। खर और दूषण के वध की घटना रामायण के अरण्यक कांड में मिलती है।
शूर्पणखा की नाक काट देने के बाद वह खर और दूषण के पास गई थी। खर और दूषण
ने अपनी- अपनी सेना तैयार कर वन में रह रहे राम और लक्ष्मण पर हमला कर दिया
था, लेकिन दोनों भाइयों ने मिलकर अकेले ही खर और दूषण का ‍वध कर दिया।अंत में सबसे बड़ा मायावी राक्षस, जानिए अगले पन्ने पर…
मेघनाद : मेघदाद को इंद्रजित भी कहा जाता है,
क्योंकि उन्होंने स्वर्ग पर आक्रमण करके उस पर अपना अधिकार जमा लिया था।
मेघनाद बहुत ही शक्तिशाली और मायावी था। उसने हनुमानजी को बंधक बनाकर रावण
के समक्ष प्रस्तुत कर दिया था।दिव्य शक्तियां : रावण के पुत्रों में मेघनाद सबसे
पराक्रमी था। माना जाता है कि जब इसका जन्म हुआ तब इसने मेघ के समान गर्जना
की इसलिए यह मेघनाद कहलाया। मेघनाद ने युवास्था में दैत्यों के गुरु
शुक्राचार्य की सहायता से ‘सप्त यज्ञ’ किए थे और शिव के आशीर्वाद से दिव्य
रथ, दिव्यास्त्र और तामसी माया प्राप्त की थी।

उसने राम की सेना से मायावी युद्ध किया था। कभी वह अंतर्धान हो जाता, तो
कभी प्रकट हो जाता। विभीषण ने कुबेर की आज्ञा से गुह्यक जल श्वेत पर्वत से
लाकर दिया था, जिससे नेत्र धोकर अदृश्य को भी देखा जा सकता था। श्रीराम की
ओर के सभी प्रमुख योद्धाओं ने इस जल का प्रयोग किया था, जिससे मेघनाद से
युद्ध किया जा सके।

मेघनाद का वध : इसने राम लक्ष्मण पर दिव्य बाण चलाया जो नागपाश में बदल गया। इससे राम लक्ष्मण मूर्छित होकर गिर पड़े। राक्षस सेना में खुशी लहर छा गई जबकि वानर सेना का मनोबल टूटने लगा।

विपरीत स्थिति देखकर हनुमान जी पवन वेग से उड़ते हुए गरूड़ जी को लेकर आए।
गरूड़ जी ने नागपाश को काटकर राम-लक्ष्मण को बंधन मुक्ति किया। राम लक्ष्मण
स्वस्थ होकर वानर सेनाका मनोबल बढ़ाने लगे मेघनाद को जब राम लक्ष्मण के
जीवित होने की सूचना मिली तो वह अपनी सेना लेकर फिर युद्घ करने आया।

इस बार लक्ष्मण और मेघनाद का प्रलंयकारी युद्घ आरंभ हुआ। दोनों एक दूसरे पर
दिव्यास्त्रों का प्रयोग करने लगे। दोनों के युद्घ को देखकर आकश के देवता
भी हैरान थे। तभी लक्ष्मण ने एक दिव्य वाण भगवान राम का नाम लेकर मेघनाद पर छोड़ दिया।

वाण मेघनाद का सिर काटते हुए आकश में दूर तक लेकर चला गया। मेघनाद की इस
स्थिति को देखकर राक्षस सेना का मनोबल पूरी तरह टूट गया और प्राण बचाकर नगर
की ओर भागने लगे। रावण को जब मेघनाद की मृत्यु का समाचार मिलता तो शोक के
कारण वह जड़वत अपने सिंहासन पर बैठ गया।
– शतायु

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