धर्म आस्था

भगवान महावीर`: आस्था के प्रतीक

भगवान महावीर`

बहुत से इतिहासकारों एवं विद्वानों ने भगवान महावीर को जैन धर्म का
संस्थापक माना है। भगवान महावीर जैन धर्म के प्रवर्तक नहीं हैं। वे
प्रवर्तमान काल के चौबीसवें तीर्थंकर हैं। जैन धर्म की भगवान महावीर के
पूर्व जो परंपरा प्राप्त है, उसके वाचक निगंठ धम्म (निर्ग्रंथ धर्म),
आर्हत्‌ धर्म एवं श्रमण परंपरा आदि रहे हैं। जैन धर्म के तेईसवें तीर्थंकर
पार्श्वनाथ के समय तक ‘चातुर्याम धर्म’ था। भगवान महावीर ने छेदोपस्थानीय
चारित्र (पांच महाव्रत, पांच समितियां, तीन गुप्तियां) की व्यवस्था की।
लेखक ने अपने ग्रंथ ‘भगवान महावीर एवं जैन दर्शन’ में श्रमण परंपरा,
आर्हत्‌ धर्म, निर्ग्रंथ धर्म तथा प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव अथवा आदिनाथ,
बाईसवें तीर्थंकर नेमिनाथ तथा तेईसवें तीर्थंकर पार्श्वनाथ के ऐतिहासिक
संदर्भों की विस्तृत विवेचना प्रस्तुत की है।

वर्तमान में बहुत से जैन भजनों में भगवान महावीर को ‘अवतारी’ वर्णित किया
जा रहा है। यह मिथ्या ज्ञान का प्रतिफल है। वास्तव में भगवान महावीर का
जन्म किसी अवतार का पृथ्वी पर शरीर धारण करना नहीं है। उनका जन्म‍ नारायण
का नर शरीर धारण करना नहीं है, नर का ही नारायण हो जाना है। परमात्मन शक्ति
का आकाश से पृथ्वी पर अवतरण नहीं है।

कारण- परमात्मा स्वरूप का उत्तारण द्वारा कार्य- परमात्मस्वरूप होकर
सिद्धालय में जाकर अवस्थित होना है। भगवान महावीर की क्रांतिकारी अवधारणा
थी कि जीवात्मा ही ब्रह्म है। आत्मा ही सर्व कर्मों का नाश कर सिद्धलोक में
सिद्ध पद प्राप्त करती है। इस अवधारणा के आधार पर उन्होंने प्रतिपादित
किया कि कल्पित एवं सर्जित शक्तियों के पूजन से नहीं, अपितु अंतरात्मा के
सम्यग्‌ ज्ञान, सम्यग्‌ दर्शन एवं सम्यग्‌ चारित्र्य से ही आत्मिक
साक्षात्का‌र संभव है, उच्च‌तम विकास संभव है। साधना की सिद्धि परमशक्ति का
अवतार बनकर जन्म लेने में अथवा साधना के बाद परमात्मा में विलीन हो जाने
में नहीं है, बहिरात्मा के अंतरात्मा की प्रक्रिया से गुजरकर स्वयं
परमात्मा हो जाने में है। भगवान महावीर ने बार-बार यह दोहराया एवं रेखांकित
किया कि प्रत्येक आत्मा में परम ज्योति समाहित है। प्रत्येक चेतन में परम
चेतन समाहित है। प्रत्येक व्यक्ति स्वयं में स्वतंत्र, मुक्त, निर्लेप एवं
निर्विकार है। शुद्ध तात्विक दृष्टि से जो परमात्मा है, वही मैं हूं और जो
मैं हूं वही परमात्मा है। मनुष्य अपने सत्कर्म से उन्नत होता है। प्रत्येक
आत्मा अपने पुरुषार्थ से परमात्मा बन सकती है। भगवान महावीर ने आत्मजय की
साधना को अपने ही पुरुषार्थ एवं चारित्र्य से सिद्ध करने की विचारणा को
लोकोन्मुख बनाकर भारतीय साधना परंपरा में कीर्तिमान स्थापित किया।


 ‘आत्मा ही परमात्मा है’, ‘ प्रत्येक प्राणी में आत्मशक्ति है,’ ‘बंधन और
मोक्ष अपने भीतर ही हैं’, ‘आत्मा का दुख स्वकृत है’, ‘अपने स्वयं के
उपार्जित कर्मों से ही आत्मा का बंधन है’, ‘बंधन से मुक्त होना तुम्हारे ही
हाथ में है’, ‘आत्मा ही अपने दुख एवं सुख का कर्ता या विकर्ता है और इसलिए
वही अपना मित्र अथवा शत्रु है’, ‘धर्म न कहीं गांव में होता है और न कहीं
जंगल में, बल्कि वह तो अंतरात्मा में होता है’, ‘धर्म उत्कृष्ट मंगल है। वह
अहिंसा, संयम, तप रूप है। जिस साधक का मन सदा उक्त धर्म में रमण करता है,
उसे देवता भी नमस्कार करते हैं’- आदि सूक्तियों में भगवान महावीर की वाणी
में क्रांतिकारिता, कल्याणकारिता एवं मनुष्य मात्र की अस्मिता एवं गरिमा की
पहचान के सूत्र निहित हैं। उनका दर्शन किसी के आगे झुककर अनुग्रह की
बैसाखियों के सहारे आगे बढ़ने की पद्धति नहीं है प्रत्युत अपनी ही शक्ति,
साधना एवं तपश्चर्या के बल पर जीवात्मा के परमात्मा बनने की प्रयोगशाला है।
यह प्राणीमात्र के कल्याण की संभावनाओं के द्वार प्रशस्त करता है। यह
प्रत्येक व्यक्ति के लिए स्वप्रयत्नों के द्वारा उच्चतम विकास कर सकने का
आस्थापूर्ण मार्ग प्रशस्त करता है। यह अंधी आस्तिकता, भाग्यवाद, परावलंबन,
बाह्य प्रदर्शन, कर्मकांड आदि का निषेध करता है। यह स्थापना करता है कि
बाह्य जगत की कल्पित शक्तियों को प्रसन्न करने के लिए किए जाने वाले
अनुष्ठानों से नहीं अपितु अपनी अंतरात्मा की पहचान, परिष्कार, शुद्धिकरण
एवं स्वरूपवास्था की प्राप्ति से ही कल्याण संभव है। प्रत्येक मनुष्य किसी
अदृश्य अलौकिक सत्ता के हाथों की कठपुतली नहीं है वरन स्वयं अपने भाग्य का
नियंता एवं निर्माता है।
आत्मा का परमात्मा होना :

प्रत्येक आत्मा में परम ज्योति समाहित है। प्रत्येक चेतन में परम चेतन
समाहित है। प्रत्येक व्यक्ति स्वयं में स्वतंत्र, मुक्त, निर्लेप एवं
निर्विकार है। प्रत्येक आत्मा अपने पुरुषार्थ से परमात्मा बन सकती है।
शुद्ध तात्विक दृष्टि से जो परमात्मा‍ है वही मैं हूं और जो मैं हूं वही
परमात्मा है। मनुष्य अपने सत्कर्म से उन्नत होता है। भगवान महावीर का जैन
दर्शन प्रत्येक जीवात्मा में परमात्मा बनने की शक्ति का उद्घोष करता है।
द्रव्य की दृष्टि से आत्मा और परमात्मा में कोई अंतर नहीं है। दोनों का
अंतर अवस्थागत अर्थात पर्यायगत है। जीवात्मा शरीर एवं कर्मों की उपाधि से
युक्त होकर ‘संसारी’ हो जाता है। ‘मुक्त’ जीव त्रिकाल शुद्ध नित्य निरंजन
‘परमात्मा’ है। ‘जिस प्रकार यह आत्मा राग-द्वेष द्वारा कर्मों का उपार्जन
करती है और समय पर उन कर्मों का विपाक फल भोगती है, उसी प्रकार यह आत्मा
सर्व कर्मों का नाश कर सिद्ध पद को प्राप्त करती है’।


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